* ﷽✨✨✨✨ * * ⊰⊰✿✿⊱⊱ ┈┈ •• * * कहानी नंबर 38* * मुझे नहीं पता, मुझे नहीं पता !! !! * ⊰⊰✿✿⊱⊱ ┈┈ •• * * * मरहूम शेख अंसारी रिज़वान अल्लाह अलैह एक ऐसे बुजुर्ग थे जो इल्म और तकवा में एक बुज़ुर्ग हैसियत रखते थे !! आज भी, ओलमा को उनके शब्दों की बारीकियों तक पहुंच होने पर गर्व करते है !! जब आप तशरीफ लाते थे, तो लोग आपसे कुछ बातों के बारे में पूछते थे !! यदि आप किसी प्रश्न का उत्तर नहीं जानते थे, तो आप जानबूझकर इसे जोर से बोलते थे !! "मुझे नहीं पता," "मुझे नहीं पता।" आपने ऐसा इसलिए किया ताकि छात्र समझ सकें कि अगर उन्हें कुछ पता नहीं है, तो उन्हें शर्मिंदा नहीं होना चाहिए कि मुझे नहीं पता है। "*बल्कि उन्हें अपनी ला इल्मी का इकरार करना चाहिए। * ⊰⊰✿✿⊱⊱ ┈┈ •• * * संदर्भ "इस्लामिक कहानियां, शहीद मुर्तजा मोताहारी", पी।200 * ⊰⊰✿✿⊱⊱ ┈┈ share please contract us +989056936120 join link https://chat.whatsapp.com/FIWUARZSWJ3CRi91NbEeZr *✨✨✨✨✨ ﷽✨✨✨✨* *•┈┈•┈┈•┈┈••⊰⊰✿✿⊱⊱••┈┈•┈┈•┈┈••* *📖✨ميں نہيں جانتا، م...
इस्लामिक वाक़ेआत