[5/11, 2:31 AM] Mohd Qamar Rizvi: पैसे देकर बाप की क़जा़ नमाज़ पढ़वाना। बाप की कज़ा नमाज़ या रोज़ा बड़े बेटे पर वाजिब है जिसे अगर बड़ा बेटा चाहे तो किसी को पैसे देकर पढ़वा सकता है लेकिन जिसे भी पैसे दे जब तक वो पढ़ ना दे सही तरीके से उस पर से वाजिब ख़तम नहीं होता इसी लिए ज़रूरी है किसी ऐसे को पैसा दे जिस पर याकीन हो कि ये पूरा कर देगा। (1512)इंसान के मरने के बाद उन नमाज़ों और दूसरी इबादतों के लिए जो वो ज़िन्दगी में ना बजा लाया हो किसी दूसरे शख्स को अजिर बनाया जा सकता है।यानी उन नमाजों को पैसे देकर पढ़वा सकते हैं। (1513)इंसान बाज मुस्तहेब कामों में मसलन हज या उमराह और रसूल व इमामों की क़ब्रों की जियारत के लिए ज़िंदा लोग भी पैसा देकर करा सकते है और ये भी कर सकते हैं कि मुस्तहें काम करें और उसका सवाब मुर्दे को हदिया कर दें। (1517)अजीर ऐसे शख्स को करे कि जिसके बारे में इतमीनान हो कि वो अमल को बजा लाएगा।और ये भी एहतिमाल हो कि सही तरीके से बजा लाएगा। (1518)जिस शख्स को मैय्यत की नमाज के लिए अजीर बनाया जाए अगर उसके बारे में पता चले की वो अमल को बजा नहीं लाया या बातिल तौर पर बजा लाया है,तो दोबा...
इस्लामिक वाक़ेआत